*सभी*शिक्षको*को*और*बच्चो*को*समर्पित* शिक्षको का दर्द तीन महीने से वेतन नही । और बिन पुरानी पेंशन के ।। दूर कर दिया है, बिन बच्चों के विद्यालय नित नए आरोप-प्रत्यारोप झेलता, शिक्षक की बगिया को, एक सरकारी शिक्षक, पतझड़ बना दिया है, चला जा रहा है, उससे उसके फूलों को, इस कोरोना काल मे, पूर्ण निष्ठा से कर्तव्य निबाहने, वो बेचैन है अंदर से कोई कह रहा है कि, किंतु ये बात सब लोग नहीं समझेंगे, बैठे-बैठे की तनख्वाह ले रहे हो, क्योकि उन्हें लगता है, कोई कह रहा है, शिक्षक कुछ करना नहीं चाहते, मजे है तुम्हारे कि बच्चे तो आते नहीं, जबकि उन्होंने सब कुछ किया है, हर कोई लांछन लगा रहा है, इस दौर में भी, शिक्षक की गरिमा को मिटा रहा है, कोरोना इयूटी से लेकर, फिर भी शिक्षक सब कुछ सुनकर, पोषाहार वितरण तक, चला जा रहा है, किंतु समाज के कुछ लोग, उससे उसकी हालत तो पूछो, कभी नहीं मानेंगे, वो मायूस है, की आज जो डॉक्टर हर तरफ, क्योकि बच्चे नहीं है, इस बीमारी से, कचोटता है उसे विद्यालय का हर भगवान की तरह लड़ रहे हैं, कोना, क्योंकि वहाँ बच्चों की हँसी उन्हें भी एक नहीं है, बच्चों की चहल पहल, शिक्षक ने ही, उनका स्वछं...
Good
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